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Showing posts from August, 2021

कुछ इस तरह से जा रही हैं ज़िन्दगी

  कुछ इस तरह से जा रही हैं ज़िन्दगी..  ना मंजिलका पता हैं ना निशान राहों के कुछ तय नहीं , कहा जाना हैं बस इतना जरूर हैं नहीं हैं रुकना बस चलते ही जाना हैं |    लगता हैं कभी  बे-मंजिल हैं ये सफ़र  निकले हैं सबब परछाईंका ढूंढने कुछ पाना हैं , जो हैं खुद में ही पता नहीं क्यूँ  फिर भी तलाश ज़ारी हैं |    वो दिन भी आएगा  होगी एक लहर सुकून की  एक पूर्ण अनुभूति ,  ' वो ' कुछ पा लेने की |    कर रहे हैं बात  अपने खुदा से  आप जिसे कहते हैं बंदगी  कुछ इस तरह से जा रही हैं ज़िन्दगी |  

बचपना

जिद करना अपनी जिद के लिए लड़ना   बड़ी जिद की खातिर छोटी छोटी खुशियाँ कुर्बान करना |   नासमज होना समज बढ़ाने की कोशिश करना सवाल करना जवाब मांगना जवाब के जवाब में और सवाल करना |   अक्षमताओ का स्वीकार करना सक्षम होने के ख्वाब देखना   गलतीयों का एहसास होना   उन्हें बदलने की कोशिश करना |   सपने देखना   सपनो की बाते करना सपनो के पीछे लगे रहना |   अगर ये सब सिर्फ बचपना हैं , तो फिर बड़ा होना किसी कहेंगे ?

इश्क की बात

  कथा अनकही बुनी हैं , क्या इश्क की   बात हैं ? बेवजह बेबयाँ सुनी हैं , क्या इश्क की बात हैं ?     उभरते रिश्तों का वजूद ,  मैं ढूँढू मन के शोर में दिल ने ख़ामोशी चुनी हैं , क्या इश्क की बात हैं ?    भागता ही रहता हू , रिश्तों किरदारो की दौड में ,  फिर क्यूं ये झुन्झुनी हैं , क्या इश्क की बात हैं ?    मन्नते उनसे मांगना हमें तो कभी आया नहीं रब ने किसकी सुनी हैं , क्या इश्क की बात हैं ?   दस्तक-ए-खुदा   सुन लेते हैं , एक अरसे से अजब  चीख ये नयी अनसुनी हैं , क्या इश्क की बात हैं ?

राहोंसे अनजान

जिन्दगीको समजके आज तुम हेरान हो मंज़िले भूल गए , या राहोंसे अनजान हो   कायम हैं गुलशन , हो पतझड़ या बहार फूल हो न खार हो , तुम तो बागबान हो   समजसे समजे ऐसा कोई इंसान ही कहाँ वाइज हमें कहेते हैं , तुम अभी नादान हो   जीवनपथ में  तुज से खुदा , मिलते ही रहें हर शख्स में तुम , हर शयकी पहचान हो   प्यार उमर से हैं परे , रिश्तो से भी हैं जुदा अलग हैं वजूद तुम्हारा , तुम ' अजब ' इंसान हो

आदत

  हर सांस गम को पीकर , जीने की आदत हो गयी टूटी कश्ती , तेज हवाएं , संभलने की आदत हो गयी    अपने घर का माहोल ही क्या , मेजबान हम , मेहमां भी हम  साक़िया को पास बिठा के पिने को आदत हो गयी   ख्वाबो खयालो की मंजिल , पाने को साथ भी सपनों का  खुद को जिंदगी दूर से ही दिखाने की आदत हो गयी    रिश्ते नाते सब नाम के , हम भी नहीं हैं कुछ काम के  ज़माने को अजब नाम के खिलोने की आदत हो गयी

वक़्त

  जबसे समज आई हैं दुनिया केवल खुदको समजाया है | अब जाकर लगता हैं ऐसा , कितना वक़्त गवांया है   कहेते हैं जो साथ किसीका , पल दो पलकी महफ़िल है मुद्दतो से देखा हैं हमने , जो साथ हैं बस साया है   पलमे बिगड़ते रिश्ते नाते , हरदम फिर सपने सजाते चलो , रूक कर सोचे कभी , क्या खोया है क्या पाया हैं   वक़्त कितना महंगा हैं , और सपनोकी कीमत हैं क्या मतलब मकसद जीवनका , इन सवालोमे समाया हैं   अब जाकर लगता हैं ऐसा , कितना वक़्त गवांया हैं