राहोंसे अनजान

जिन्दगीको समजके आज तुम हेरान हो

मंज़िले भूल गए, या राहोंसे अनजान हो

 

कायम हैं गुलशन, हो पतझड़ या बहार

फूल हो न खार हो, तुम तो बागबान हो

 

समजसे समजे ऐसा कोई इंसान ही कहाँ

वाइज हमें कहेते हैं, तुम अभी नादान हो

 

जीवनपथ में  तुज से खुदा, मिलते ही रहें

हर शख्स में तुम, हर शयकी पहचान हो

 

प्यार उमर से हैं परे, रिश्तो से भी हैं जुदा

अलग हैं वजूद तुम्हारा, तुम 'अजब' इंसान हो

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