कैद

कोई काम में, कोई आराम में

कोई ख़ास में, कोई तमाम में


भरी महफ़िल के धमाके में कोई

या, बंद कमरे के सन्नाटे में कोई

 

कुछ लकीरों में, कुछ अल्फाजो में

कुछ सुर, ताल, और अंदाजो में

 

कोई जानेवाले की चाहत में

कोई आनेवाले की आहट में

 

कभी अपने में, कभी जपने में

कभी पुरे अधूरे सपने में

 

कोई खुद में, कोई समाज में

कोई सरेआम तो कोई राज में

 

कुछ प्यार में, कुछ बाज़ार में

कोई वैराग्य तो कोई संसार में

 

हो चुके की जिक्र में कोई

तो, ना हुए की फ़िक्र में कोई

 

कैद हैं हम सब|

 

हा, कैदखाना बदलने की आज़ादी जरुर है |

 

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