वक़्त

 

जबसे समज आई हैं दुनिया

केवल खुदको समजाया है |

अब जाकर लगता हैं ऐसा,

कितना वक़्त गवांया है

 

कहेते हैं जो साथ किसीका,

पल दो पलकी महफ़िल है

मुद्दतो से देखा हैं हमने,

जो साथ हैं बस साया है

 

पलमे बिगड़ते रिश्ते नाते,

हरदम फिर सपने सजाते

चलो, रूक कर सोचे कभी,

क्या खोया है क्या पाया हैं

 

वक़्त कितना महंगा हैं, और

सपनोकी कीमत हैं क्या

मतलब मकसद जीवनका,

इन सवालोमे समाया हैं

 

अब जाकर लगता हैं ऐसा,

कितना वक़्त गवांया हैं

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