मा
जिसकी सुनी गोद में
चैन जहाँ का आता था
जिसकी छाती से लिपटके
नींद सुहानी पाता था
उन दो शख्सो की बातों में
जनम जनम का नाता था
वो गोद कहाँ वो रात कहाँ
वो जनम जनम की बात कहाँ
सिने से लिपटके रोता था
इतना था उसमे अपनापन
समज, सन्मान प्यार तो हैं
नहीं महसूस होता बचपन
वो कान जो मेरी नासमजी को
बेइंतेहा सुनते थे
वो आँखे जिसमे मेरे सपने
साथ मिलके बुनते थे
वो बचपन वो हाथ कहाँ
वो नासमजी की बात कहाँ
समज के साये ने फिर
लूट लिया मेरा बचपन
चल दिए सफर को उठाके
कल झुकी हुई गरदन
रुकेंगे कभी तो फिर कहीं
खुद को खुद ही समजायेंगे
दुनिया की बात बताएँगे
बहलाके दिल मनाएंगे
जुबाँ पे सजदा और
ज़हन में अदब
प्यार बांटते जायेंगे
मा आएगी याद जब
अश्क-ए-शुक्र बहायेंगे
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