अपने पर से ध्यान हटाओ
नारी पर बढते अत्याचार, खबरें आने लगी अपार
अपने पुरुष होने पर आने लगी थी घिन्न अपार
बेटा, भाई, पति, पिता, दोस्त का किरदार हैं जिम्मेवार
बौद्धिकता ने बहलाया की तेरी भी तो कोई फ़र्ज़ है यार
विरोध जताया, केंडल जलाए, पिटीशन पे भी मोहर लगाईं
जागृत नागरिक बने ही थे की, रूह से कोई आवाज आई
मा, बहेन, पत्नी, और बेटी, सखी को भी पास बिठाओ
उनको समजना है तो पहेले अपने पर से ध्यान हटाओ
स्व-केंद्रित सालों से हम हैं, परवरिश भी ऐसी ही हैं
अपने को छोड़ उनको समजे, मुश्किल शर्त ये कैसी है?
भाव देकर ही पाला हमको, औजार था बचपन का रोना
ज्यादा और पहेले मिला हैं, खाना, किताब या हो खिलौना
थोड़े ही बड़े हुए थे भैया, पैमाने वो बदल गए थे सारे
आंसू, भावना, और संवेदना, छूट गए वो दोस्त हमारे
लाओ, पाओ, कमाओ की आस, ‘देने’ पर ही बनोगे खास
पर्फोर्मंसकी रेस में अब, गुस्सा डर ही रह गए थे पास
हर संबंध का केंद्र हम थे, पूरा ध्यान भी हम पे ही तो था
पूजा, पैसा, घर, और रिश्ते, लगा हमारे दम पे ही तो था
जिम्मेवारी और किरदारों की भीड़ में यु खो से गए थे
सर्वदेयी के अहंकार में न जाने कब से सो से गए थे
आन्दोलन, स्लोगन को छोडो, खुद को इस नींद से उठाओ
अच्छा पुरुष बनना हैं तो केवल अपने पर से ध्यान हटाओ
Very beautifully written . Loved it sir. Your thoughts , your provokations have inculcated a unique trait in many of us. A trait of introspection, a trait of unapologetically asking questions, one that helps us question our biases and improve the awareness . Dheere dheere sachhhai ka acceptance badh raha hain.. sukoon sa lagta hain...kuch sachhaiyose cheedh bhi machti hain par ab cheeje thodi saaf najar ati hain
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