जिंदगी
जिंदगी को जिंदगी की तरह जिया हैं मैंने
आसुओं को उम्मिदो के साथ पिया है मैंने
दिल को ख़ारिज कर, दिमाग से चलते रहें
उनकी ख्वाहिशों को मंजिल किया हैं मैंने
अरसों की ये आस अब रूह को ही चिर गयी
टूटे हुए लम्हों से एहसासों को सिया है मैंने
भीड़ लगी रहती है चहेरों की आईने में अब
कौनसा नकाब कबसे कहासे लिया हैं मैंने
सर्वग्राही और सर्वदेयी की सोचमें चल दिए
खुद को खुदाई का गुमान दिया हैं मैंने
तेरी इनायत तबसे महसूस किये जा रहें हैं
इबादत का रुख जब से छोड़ दिया हैं मैंने
Comments
Post a Comment