बेवजह
चार दिन की चांदनी, हम इसके मेहमान हैं
फिर बेवजह ऐसे क्यूं हमारे अरमान हैं ?
क्यूं हमारे लिए कोई जान लुटा दे अपनी,
बेसबब तबस्सुम भी, हम पे तो अहेसान हैं
मेरे अल्फाजों को इरशाद कहते हैं सभी,
दिल को ये काफी नहीं, अभी भी बेजान हैं
मर मिटेंगे सुनने वाले, पर क्यां करें?
महफ़िल का वो एक कोना तो वीरान हैं
बड़े समजदार हो, कहते रहते दुनियावाले,
उनको तो समज लिया, खुद से अनजान हैं
हैरान हो के भले ही, शिकवा करता अजब,
सोचता हैं मगर कोई उसके लिए परेशान हैं
Comments
Post a Comment