मैं
बनता मैं
बिगड़ता मैं
टूटता मैं
संवरता मैं
आसूं मैं और
आस भी मैं
साधारण सा और
खास भी मैं
उलझनों में
सुलझा सा मैं
सुलझाने में
उलझा सा मैं
पहाड मैं
झरना मैं
उभारना मैं
उभरना मैं
गिरना मैं और
बहना भी मैं
मंजिल मै
प्रवास मैं
आयोजित, और
अनायास भी मैं
शून्य मैं
सहस्त्र मैं
विजयी और
परस्त मैं
सोच मैं
एहसास मैं
शख्स मैं
अक्स मैं
यहीं मैं, और
कही भी मैं
हू मैं, और
नहीं भी मैं
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