बेजवाब सवाल

 

मै कहा हू,

कहा था,

कहा जा रहा हू?

 

सवाल ऐसे, हरदम उठते है जहनमे

और रह जाते है

बेजवाब्, हरदम।

 

मा-बापसे बिछड़े हुए बच्चेकी तरह

सहमे से, असुरक्षित

पर आशावादी भी।

 

ये आशा भी कितनी अजब् हैं, ना

निरन्तर

किन्तु तरन्गो जैसी

उतार चढ़ाव हि इसकी सच्चाई।

 

उमन्ग रहेता हैं, उतार मे तो

चढ़ाव मे ही सोच बढती हैं

और सवाल उठते हैं।

 

सवाल

क्या करे इन सवालोका की जिनका

जवाब् ही ना मिले

ये बेजवाब् सवाल बोज़् बन जाते हैं

नन्हे से मनकी छोटी सी पीठ पर

 

बच्चे की पीठ का भार तो मा-बाप उठाते

मन की पीठ का भार कौन उठाएगा।


 

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