फ़र्ज़ निभाते हैं

 समजाते हैं कभी बहलाते हैं 

हम हरदम फ़र्ज़ निभाते हैं

 

सूरज नहीं तो बनके दिया 

मिलेगा मुजको मेरा पिया 

जीवनपथ के अंधियारेमें, 

इसी सोच से जाते हैं

 

फुल पंछी या पौधेमे 

मिला दोस्तीके घरोंदोमे 

माने न माने हर सांसमें

उसके निशान पाते हैं

 

 नहीं करता सजदा ‘अजब’

की दिल से उसका नाता हैं

बिना जुकाए सर उसको 

हम अपनी बात समजाते हैं

 

हम हरदम फ़र्ज़ निभाते हैं

Comments

Popular posts from this blog

बातें

सोचा हैं कभी?

कैद