कुछ और ही

 

लेना-देना तो दुनिया हैं

आसमानी कुछ और ही

प्यार दिलो कि बात हैं

रुहानी कुछ और ही

 

खुद ही का जिक्र हैं और

फर्क की ही फ़िक्र हैं,

बेईलाज़ रह जायेगी तेरी

परेशानी कुछ और ही

 

नहीं उलझना सेकडोंमे

खुद बनाऊंगी रास्ता 

चाहे मस्तानी कह लो

अभिमानी कुछ और ही

 

भीड़ और तन्हाई मे

खो गया हैं मेरा वजूद

जिये तो जा रहा हूँ पर

जिंदगानी कुछ और ही

 

ख्याल समज आये तो

अल्फाजों को रिहाई दी

मांगी हुई चुपकिदी हैं ये

बेजुबानी कुछ और ही

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