लकीर और अल्फाज़
हर वक्त एक कशिशसी रहती हैं
बयां करने की..
खुद को खुद से और औरो से भी |
कहाँ कहा कर पाते हैं, पूरा बयां?
अल्फाजों के भी तो दायरे होते हैं, ना
जहा पर शब्दों का प्रभाव खत्म होता हैं,
वहासे लकीरोंका काम शुरू होता हैं..
लकीरें...
कितना कुछ कह जाती हैं लकीरें
बयां करनेकी कोशिश किये बिना ही..
और, मुक्त कर देती हैं देखनेवालो को..
न की अल्फाज़की तरह
जो बांध लेते हैं सुननेवालो को, क्युकी
अल्फाजों को समजाना जो होता हैं,
बया करनेका बोज़!!
पर लकीरे..
लकीरे तो बेफिक्र, बेसबब, आजाद...
अल्फाज़ जरूरत हैं, और
लकीरे शायद वजूद!!
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