मुझे घर जाना हैं
मुझे घर जाना हैं
जबभी मैं होता हूँ,
मायूस, असुरक्षित या असक्षम
मुजमें से कोई
यु ही बोल देता हैं की
मुझे घर जाना हैं
सब कहते हैं, जाओ,
और इशारा कर देते हैं
उस पते वाले मकानकी और...
पर..
ये मकान, वो घर नहीं..
मुझे तो 'अपने' घर जाना होता हैं, मकान नहीं!!
घर..घर जाने वाला घर
शायद ये कोई जगह नहीं हैं,
जहा मैं पहुँच सकु
न ही यह कोई पद हैं
जो मैं प्राप्त कर सकू..
ये घर एक कल्पना हैं,
मात्र अनुभूति!!
ये न स्थल हैं, और
शायद समय भी नहीं..
या फिर शायद
स्थल और समय का ही कोई संयोग
एक ऐसा संयोग, ऐसे कुछ क्षण,
जिसमे में
बस एक एहसास बनके रह जाऊं..
और
एहसास बनके ही रह पाऊ..
कुछ ऐसे क्षण की जिसमे
मैं सिर्फ मैं बन सकू
न बेटा, न, भाई, न पति, दोस्त या प्रेमी...सिर्फ मैं
न क्रेता, न विक्रेता, न अधिकारी या उतरदायी...सिर्फ मैं
या फिर शायद मैं भी नहीं..
कुछ ऐसे क्षण की जिसमे
बेवज़ह चुप रह सकू..
अपनी उन कुछ अनसोची, अनकही, अन-करी
बातों को मल सकू
न धर्मकी , न समाजकी , न संवेदना, न चेतनाकी..
सिर्फ अपनी..सुनु
ये घर शायद एक अवस्था हैं
जो प्राप्त नहीं होती
हो सकती हैं तो बस
उसको पानेकी अविरत कोशिश
कोशिश करते रहेते है
हम घर ढ़ुंढ़ते रहेते हैं
इस तलाशको ही
शायद जिंदगी कहेते हैं
मुझे कहा कुछ पाना हैं
मुझे तो घर जाना हैं
घर जाना हैं
Comments
Post a Comment